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बन गयी झील आइने जैसी

सरफ़राज़ शाकिर

सम्ते-कुहसार क्या है देखो तो
आसमाँ झुक रहा है देखो तो

बन गयी झील आइने जैसी
अक्स उठा हुआ है देखो तो

दूर तक नक़्शे-पा ही नक़्शे-पा
रास्ता हो गया है देखो तो

मेरा साया जो साथ था अब तक
रात से जा मिला है देखो तो

पेड़ सारा बिखर गया लेकिन
जूँ का तूँ घोंसला है देखो तो

दश्त में ख़ामुशी बिछी तो बिछी
शहर वीराँ पड़ा है देखो तो

चाँद-तारों के दर्मियाँ 'शाकिर'
हार मोती जड़ा है देखो तो


चाँद पर मेला लगायें और देखें

सरफ़राज़ शाकिर
सिवांची गेट, मंगलियान की गली, जोधपुर, राजस्थान

पेड़ पर पानी उगायें और देखें
धूप के कपड़े सिलायें और देखें

ख़ाली-ख़ाली बादलों को छेड़ें चलकर
रेत को पट्टी पढ़ायें और देखें

घुप अन्धेरों से करें कुछ तो ठिठोली
रात भर हल्ला मचायें और देखें

दिल करें है हाथ धो लें जाँ से अपनी
जा के मिट्टी में नहायें और देखें

एक दिन ऐसा करें उड़कर ख़ला1 में
चाँद पर मेला लगायें और देखें

झूल जायें थामकर सूरज की किरनें
जेब में भर लें हवाएँ और देखें

कुछ भी लेकर घर न जायें अबकि 'शाकिर'
प्यार की टॉफ़ी बनायें और देखें

1 ख़ला: शून्य; निर्वात; धरती और आकाश के बीच निर्वात में

न मंज़िल हूँ न मंज़िल आशना हूँ

अतहर नफ़ीस

न मंज़िल हूँ न मंज़िल आशना हूँ
मिसाले-बर्ग उड़ता फिर रहा हूँ

मेरी आँखों के ख़ुश्को-तर में झाँकों
कभी सहरा कभी दरिया नुमा हूँ

वह ऐसा कौन है जिससे बिछड़कर
ख़ुद अपने शहर में तन्हा हुआ हूँ

जो मेरी रूह में उतरा हुआ है
मैं उससे बेतअल्लुक भी रहा हूँ

सुला दो ऐ हवाओं अब सुला दो
बहुत रातों का मैं जागा हुआ हूँ

दिल है हीरे की कनी, जिस्म गुलाबों वाला

मंज़र भोपाली


दिल है हीरे की कनी, जिस्म गुलाबों वाला
मेरा महबूब है दरअस्ल किताबों वाला

हुस्न है - रंग है - शोख़ी है - अदा है उसमें
एक ही जाम मगर कितनी शराबों वाला

यार आईना हुआ करते है यारों के लिए
तेरा चेहरा तो अभी तक है हिजाबों वाला

मुझसे होगी नहीं दुनिया यह तिजारत दिल की
मैं करूँ क्या कि मेरा ज़हन है ख़्वाबों वाला

तू रहे या न रहे जुल्म रहेंगे बाक़ी
दिन तो आना है किसी रोज़ हिसाबों वाला

हुस्ने-बेबाक़ से हो जाती हैं आँखें रोशन
दिल में उतरा है मगर रूप हिजाबों वाला

जो नज़र आता है हासिल नहीं होता ‘मंज़र’
ज़िंदगी का भी सफ़र है सराबों वाला

ग़ुबार साफ़ करो आईने की आँखों से

अक़ील नोमानी

मिटा के ख़ुद को तुम्हें पाना चाहता हूँ मैं
हमेशा अपने ही काम आना चाहता हूँ मैं

अजीब धुन है कि मंज़िल मुझे तलाश करे
सो रास्ते से भटक जाना चाहता हूँ मैं

ग़ुबार साफ़ करो आईने की आँखों से
कि साफ़-साफ़ नज़र आना चाहता हूँ मैं

तेरा मिज़ाज बहुत कुछ बदल गया लेकिन
वहाँ नहीं है जहाँ लाना चाहता हूँ मैं

न अब दरीचा खुलेगा न कोई झाँकेगा
उधर से फिर भी गुज़र जाना चाहता हूँ मैं

यह मसअला भी है मेरी समझ के साथ ‘अक़ील’
कि दूसरों को भी समझाना चाहता हूँ मैं

ऐ अहले-सियासत ये क़दम रुक नहीं सकते

मुनव्वर राना

ऐ अहले-सियासत ये क़दम रुक नहीं सकते
रुक सकते हैं फ़नकार क़लम रुक नहीं सकते

हाँ होश यह कहता है कि महफ़िल में ठहर जा
ग़ैरत का तकाज़ा है कि हम रुक नहीं सकते

यह क्या कि तेरे हाथ भी अब काँप रहे हैं
तेरा तो ये दावा था सितम रुक नहीं सकते

अब धूप हक़ीक़त की है और शौक़ की राहें
ख़ाबों की घनी छाँव में हम रुक नहीं सकते

हैं प्यार की राहों में अभी सैकड़ों पत्थर
रफ़्तार बताती है क़दम रुक नहीं सकते